
कुलडांगा गांव जैसे बरसों से एक ही जगह ठहरा हुआ है। वही पुरानी सूखी लाल मिट्टी का रास्ता। गांव के एकदम आखिरी छोर पर एक टूटी-फूटी कोठी। दीवारों का प्लास्टर झड़ चुका है और ईंटें किसी कंकाल की तरह बाहर झांक रही हैं। खिड़कियों की सलाखों पर जंग लग गया है। कोठी की जमीन सीलन भरी और गीली है और वहां से पुरानी सड़ी हुई लकड़ी की एक अजीब सी गंध आ रही है। दोपहर से ही आसमान में काले बादल छाने लगे थे और शाम होते ही ठंडी हवा चलने लगी—बिल्कुल वैसी ही, जैसी बारिश से ठीक पहले चलती है।
हम उसी पुरानी लावारिस कोठी में रुके। चारों तरफ एकदम सन्नाटा था। कोठी के बाहर बस हवा की 'सां-सां' सुनाई दे रही थी। कभी-कभी टूटे हुए दरवाजे दीवार से टकरा रहे थे—धमाधम आवाज के साथ। हमारे पैरों के नीचे सूखी लकड़ियां 'चटाचट' टूट रही थीं। हर आहट उस सन्नाटे को और भी डरावना बना रही थी।
कोठी के अंदर का माहौल बहुत अजीब था। हमने हॉल के एक कोने में अपने बैग रख दिए। जॉनसन खिड़की के बाहर देख रहा था। बाहर हवा का शोर बढ़ता जा रहा था और कभी-कभी ऐसा लग रहा था जैसे कोई फुसफुसा रहा हो। अचानक किचन की तरफ से कुछ गिरने की आवाज आई—जैसे कोई लोहे की चीज फर्श पर गिरी हो। जॉनसन एकदम चौंक गया। मैंने कहा, "अरे, कोई चमगादड़ होगा।"
जॉनसन ने टॉर्च की रोशनी दीवार की तरफ घुमाई। वहां तेल से बनी एक पुरानी धुंधली तस्वीर थी। उसका फ्रेम टूटकर लटका हुआ था और तस्वीर में एक मेमसाहब का चेहरा धुंधला सा दिख रहा था। इस कोठी का इतिहास भी बड़ा अजीब है। सोम मुर्मू बता रहे थे कि नील की कोठियां तो बहुत होती हैं, पर यह कोठी अलग है। गांव वाले इसे 'पुतुल कोठी' (पुतलियों वाली कोठी) कहते हैं। नील की खेती बंद होने के बाद यहां एक पागल अंग्रेज साहब अकेले रहते थे। कहते हैं कि वो इंसानों जितने बड़े लकड़ी के पुतले बनाते थे। वो उन्हें खाना खिलाते थे और उनसे बातें करते थे। साहब की मौत के बाद वो पुतले कभी नहीं मिले। लोग कहते हैं कि वो पुतले आज भी कोठी के अंदर ही कहीं छिपे हैं और साहब के लौटने का इंतजार करते हुए रात भर जागते हैं।
अचानक जॉनसन ने अपनी जेब में हाथ डाला और उसका चेहरा डर के मारे सफेद पड़ गया। उसने जेब से एक पुराना चांदी का सिक्का निकाला और बोला, "अभ्र, यह सिक्का मेरी जेब में कैसे आया?" मैंने सिक्का हाथ में लिया। उस पर एक नक्काशी बनी थी—ठीक वैसे ही जैसे 'चादर बांधनी' पुतली नाच रही हो। अचानक कमरे का तापमान और गिर गया, इतनी ठंड कि हड्डियों तक को कंपा दे। बाहर से 'धामसा' (ढोल) बजने की आवाज अब बिल्कुल करीब आने लगी, जैसे कोठी के आंगन में ही कोई ढोल बजा रहा हो।
अगले दिन सुबह का नज़ारा बिल्कुल अलग था। धूप में लाल मिट्टी चमक रही थी। कल रात का वो डर और छटपटाहट अब कहीं नहीं थी। हम कोठी से निकलकर गांव में सोम मुर्मू के घर गए। वे बहुत ही सीधे-साधे इंसान थे, उम्र काफी हो चुकी थी लेकिन उनके हाथों का काम आज भी बहुत ही शानदार था। वे अपने घर के आँगन में बैठकर काम कर रहे थे। पास ही में शिरीष की लकड़ी का एक बड़ा टुकड़ा पड़ा था, जिसे तराशकर वे पुतलियां बना रहे थे। हम उनके पास जाकर बैठ गए और बातों का सिलसिला शुरू हुआ, मानो कल रात कुछ हुआ ही न हो।
सोम बाबू ने बहुत ही सहज तरीके से हमें समझाया। बीरभूम की इस लोककला का नाम है—'चदर-बदर'। इसे चादर से घेरकर रखा जाता है, इसलिए इसे 'चादर बांधनी' भी कहते हैं। उन्होंने हमें एक लकड़ी का बड़ा सा बक्सा दिखाया, जो काफी भारी था—लगभग बीस किलो का। बक्से पर बहुत ही सुंदर नक्काशी की गई थी, जो दरअसल पुतलियों का मंच था। सोम बाबू नीचे बैठ गए, ऊपर कुछ लकड़ी की पुतलियां थीं। उन्होंने जैसे ही धागे खींचे और अपने पैरों के घुंघरू बजाए, पुतलियां अचानक नाच उठीं! वो मंजर इतना अद्भुत था कि लगा जैसे बेजान लकड़ी में जान आ गई हो।
हम मंत्रमुग्ध होकर उन्हें देख रहे थे। जॉनसन भी अब काफी शांत लग रहा था, उसने अपनी नोटबुक निकाली और स्केच बनाने लगा। वे पुतलियां सात-आठ इंच की थीं, रंगीन कपड़े पहने हुए और सांवली सूरत वाली। सोम बाबू मुस्कुराते हुए बोले, "ये सब मेरे बच्चे हैं।" हमने उनके साथ चाय-मुड़ी खाई। आँगन में बच्चे खेल रहे थे और दूर से ढोल-नगाड़ों की धीमी आवाज़ आ रही थी। सब कुछ कितना आसान और शांति भरा लग रहा था।
लेकिन लौटते वक्त सोम बाबू ने एक बात कही। बहुत ही शांत और गंभीर आवाज़ में। उन्होंने कहा, "कोठी में रह रहे हैं, रहिए। लेकिन रात के वक्त पुतलियों के बक्से को हाथ मत लगाइएगा।" मैं हैरान रह गया और जॉनसन भी ठिठक गया। सोम बाबू वापस अपने काम में जुट गए और हमें सवाल पूछने का मौका ही नहीं मिला। कोठी की ओर लौटते वक्त सूरज ढल रहा था और वही बर्फीली ठंडी हवा फिर से चलने लगी थी। शाम की हल्की रोशनी में वो कोठी बहुत अकेली और डरावनी लग रही थी।
शाम ढलते ही कोठी का मिज़ाज फिर से बदल गया। हमने एक लालटेन जलाई और कमरे में बैठ गए। कमरे में हवा बिल्कुल नहीं थी, लेकिन फिर भी लालटेन की लौ थरथर कांप रही थी। बाहर झींगुरों की आवाज़ अचानक बंद हो गई—चारों तरफ एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। जॉनसन अपनी डायरी लिख रहा था, तभी अचानक उसने अपनी कलम रोक दी। उसका पूरा ध्यान कहीं और था। उसने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा, "अभ्र, कुछ सुनाई दे रहा है?"
कोठी की दूसरी मंज़िल से एक आवाज़ आ रही थी—'खट... खट... खट'। ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत धीरे-धीरे लकड़ी के फर्श पर चल रहा हो। लेकिन कोठी की सीढ़ियां तो बरसों पहले टूट चुकी थीं, वहां किसी का होना नामुमकिन था। वह आवाज़ ठीक हमारे सिर के ऊपर आकर रुक गई। कुछ देर सब खामोश रहा, और फिर अचानक ऐसा लगा जैसे ऊपर से कोई भारी चीज़ घसीटी जा रही हो—बिल्कुल वैसे ही, जैसे लकड़ी का कोई भारी संदूक फर्श पर रगड़ा जा रहा हो।
हवा में पुराने चंदन की महक भर गई। जॉनसन अपनी जेब से वह चांदी का सिक्का निकालकर उसे बहुत गौर से देख रहा था। अचानक सिक्का उसके हाथ से छूटकर फर्श पर गिरा और अपने आप घूमने लगा। उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो कोई अदृश्य उंगली उसे नचा रही हो। घूमते-घूमते वह सिक्का दीवार पर टंगी उस मेमसाहब की तस्वीर के नीचे जाकर रुक गया। मैंने टॉर्च की रोशनी डाली, तो देखा कि तस्वीर के नीचे फर्श पर लकड़ी का कुछ बुरादा पड़ा हुआ था—जैसे किसी ने अभी-अभी वहां लकड़ी तराशी हो। मैंने ऊपर की तरफ देखा, तो छत की कड़ी से एक बारीक धागा लटक रहा था। धागा एकदम तना हुआ था, मानो ऊपर से किसी ने उसे मजबूती से पकड़ रखा हो। जॉनसन ने जैसे ही हाथ बढ़ाकर उस धागे को छूने की कोशिश की, कोठी के सारे दरवाज़े और खिड़कियाँ एक साथ धड़ाधड़ बंद हो गए और लालटेन बुझ गई। उस गहरे अंधेरे में मुझे महसूस हुआ कि जॉनसन बिल्कुल मेरे कान के पास सांस ले रहा है—लेकिन वह सांस बर्फ जैसी ठंडी थी।
जॉनसन अचानक डुक-डुक कर रोने लगा। मैंने माचिस जलाई, तो देखा उसका चेहरा डर से नीला पड़ चुका था। उसने कांपते हाथों से अपने बैग से एक पुरानी चमड़े की डायरी निकाली—यह उसके परदादा एडवर्ड साहब की डायरी थी। पन्ने इतने पुराने और पीले थे कि ज़रा सा ज़ोर पड़ते ही टूट जाएं। जॉनसन फर्श पर बैठ गया और बुदबुदाया, "अभ्र, मैं यहाँ सिर्फ रिसर्च करने नहीं आया था... मैं इस खानदानी अभिशाप से पीछा छुड़ाने आया हूँ।"
उसने डायरी का एक पन्ना खोला। जून १८९० की बात थी। एडवर्ड साहब ने उन आदिवासी लड़कियों के बारे में लिखा था जो कोठी में काम करने आती थीं और फिर कभी वापस नहीं लौटीं। साहब को पुतलियां बनाने का शौक था, लेकिन गाँव में अफ़वाह थी कि वे सिर्फ लकड़ी का इस्तेमाल नहीं करते—पुतलियों को 'ज़िंदा' करने के लिए उनके अंदर इंसानी हड्डियाँ और मांस भर देते थे। डायरी के आखिरी पन्ने पर इसी कोठी का नक्शा बना था और नीचे खून जैसी लाल स्याही से लिखा था— "खून का कर्ज चुकाना होगा।"
जॉनसन के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। उसने कहा, "पापा ने मरते वक्त मुझे यह डायरी और वह सिक्का दिया था। उन्होंने कहा था कि हमारे वंश का पाप इसी मिट्टी में दबा है। मैंने कभी यकीन नहीं किया, लेकिन यहाँ आने के बाद..." जॉनसन की हालत बिगड़ती जा रही थी, वह पागलों की तरह अपने नाखूनों से फर्श को खुरचने लगा। अचानक उसकी आवाज़ बदल गई, वह किसी बूढ़े इंसान की तरह भारी आवाज़ में बोलने लगा। रात बढ़ने के साथ-साथ ज़मीन के नीचे से ढोल की आवाज़ें तेज़ होने लगीं।
तहखाने का दरवाज़ा भारी और पुराना था। जैसे ही हमने उसे धक्का दिया, वह चीखते हुए खुल गया। अंदर से सड़ी हुई लकड़ी और सदियों पुरानी धूल की गंध आई। सीढ़ियाँ उतरते समय ऐसा लग रहा था मानो हम किसी पाताल लोक में जा रहे हों। नीचे पहुँचते ही टॉर्च की रोशनी में जो दिखा, उसे देखकर मेरा कलेजा मुंह को आ गया।
वहाँ इंसानी कद के पाँच-छह पुतले खड़े थे। उनकी आँखों में कांच लगा था, जो टॉर्च की रोशनी में चमक रहा था। वे इतने असली लग रहे थे कि लग रहा था अभी बोल पड़ेंगे। बीच में एक बहुत बड़ा लकड़ी का संदूक रखा था। जॉनसन जैसे किसी सम्मोहन (trance) में था। वह धीरे-धीरे उस संदूक की ओर बढ़ा। मैंने उसे रोकना चाहा, पर मेरे गले से आवाज़ ही नहीं निकली।
जैसे ही जॉनसन ने संदूक का ढक्कन खोला, कोठी की दीवारों से ज़ोर-ज़ोर से हँसने की आवाज़ें आने लगीं। संदूक के अंदर से एक काली परछाईं उभरी—वह पुतलों का 'मास्टर' था। जॉनसन के शरीर में अजीब बदलाव होने लगे। उसकी चमड़ी पीली पड़कर लकड़ी जैसी सख्त होने लगी। उसके जोड़ों से 'कड़क-कड़क' की आवाज़ आने लगी, जैसे सूखी लकड़ी टूट रही हो। वह चिल्लाना चाहता था, पर उसके मुँह से आवाज़ की जगह लकड़ी का बुरादा निकलने लगा।
तभी अंधेरे से सोम मुर्मू की आवाज़ गूँजी, "मैंने कहा था न बाबू, पुतलों को हाथ मत लगाना!"
मैंने देखा, जॉनसन के हाथ-पैर अदृश्य धागों से बंध चुके थे। वह हवा में किसी कठपुतली की तरह लटक रहा था और ऊपर से कोई उसे नचा रहा था। वह नर्तक और कोई नहीं, वही पुराना अंग्रेज साहब था, जिसकी तस्वीर ऊपर लगी थी। उसकी आँखों में कोई रहम नहीं था, बस एक क्रूर मुस्कान थी।
मैंने बिना सोचे-समझे अपनी जेब से वह छोटी पुतली निकाली जो सोम मुर्मू ने मुझे दी थी। मुर्मू ने कहा था, "विपत्ति में यह काम आएगी।" मैंने उस पुतली को आग के हवाले किया और जलती हुई पुतली को उन अदृश्य धागों की ओर फेंका। एक तेज़ धमाका हुआ और धागे जलने लगे। आग की लपटें तेज़ी से कोठी में फैलने लगीं।
जॉनसन की आँखों में आखिरी बार मैंने इंसानियत देखी, फिर वह पूरी तरह से लकड़ी का बन गया और आग की लपटों में समा गया। मैं किसी तरह गिरते-पड़ते बाहर निकला। पीछे मुड़कर देखा तो पूरी कोठी धू-धू कर जल रही थी और आग की लपटों के बीच दो साये नाच रहे थे—एक साहब और एक जॉनसन।
अगले दिन सुबह पता चला कि सोम मुर्मू अपने घर में मृत पाए गए। उनके पास उनकी सबसे प्रिय पुतली जली हुई मिली, जिसका चेहरा हुबहू जॉनसन जैसा था।
मैं कोलकाता वापस आ गया हूँ, लेकिन रातें अब वैसी नहीं रहीं। कभी-कभी जब सन्नाटा होता है, तो मुझे अपने बेडरूम की छत से कुछ रगड़ने की आवाज़ आती है। आईने में देखता हूँ तो मुझे महसूस होता है कि मेरी उंगलियाँ धीरे-धीरे सख्त हो रही हैं... जैसे वे भी लकड़ी में बदल रही हों। 'पुतुल कोठी' का खेल शायद अभी खत्म नहीं हुआ है।
